बीजिंग: भारत और अमेरिका के संबंध को जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप ने 25 साल पीछे धकेल दिया है, उससे अगर कोई सबसे ज्यादा खुश होगा तो वो चीन है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसका दोनों हाथों से फायदा उठाने की तैयारी में हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एससीओ समिट में भाग लेने चीन के तियानजिन शहर पहुंच गये हैं। जिसको लेकर सीएनएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का रेड कार्पेट स्वागत किया जा रहा है। यानि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की चीन में होने वाली बैठक के जरिए शी जिनपिंग ग्लोबल पॉलिटिक्स को हमेशा के लिए बदल देने की कोशिश करेंगे।
SCO शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ट्रंप के टैरिफ युद्ध ने सबसे ज्यादा अमेरिका के सहयोगियों को परेशान किया है। अमेरिका के करीब करीब सभी सहयोगी देशों की अर्थव्यवस्था पर टैरिफ का सबसे गहरा असर होगा और भारत, जिसपर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया गया है, उसकी इकोनॉमी पर इस टैरिफ का घातक असर होने की आशंका है। सीएनएन ने कहा है कि ट्रंप की नीतियों की वजह से चीन को वो मौका मिला है, जिसे उसने कुछ दिन पहले तक सपने में भी नहीं सोचा था। अब चीन ने इस एससीओ शिखर सम्मेलन को, पिछले 10 सालों में सबसे बड़ा समिट बना दिया है, जिसमें करीब 26 देशों के नेता हिस्सा ले रहे हैं।
SCO शिखर सम्मेलन से चीन बनेगा वैश्विक नेता?
सीएनएन के मुताबिक शी जिनपिंग इस शिखर सम्मेलन के जरिए अमेरिकी टैरिफ से राहत दिलाने वाला, एक स्थाई और वैकल्पिक देश के तौर पर पेश करने की है और इसे वो दोनों हाथों से भुनाने की कोशिश कर रहा है। इस शिखर सम्मेलन की सबसे खास बात ये होने वाली है कि इसमें भारत और पाकिस्तान जैसे कट्टर विरोधी, ईरान और सऊदी अरब जैसे ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी भी शामिल हो रहे हैं। सीएनएन ने एक्सपर्ट्स के हवाले से कहा है कि यही विविधता SCO की सबसे बड़ी ताकत है, क्योंकि यह दिखाता है कि बीजिंग, एशिया-यूरोप क्षेत्र में इतना प्रभावशाली हो चुका है, कि वह विरोधियों को भी एक ही टेबल पर बैठाकर बातचीत करवा सकता है। पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी ऑफ लाहौर की विशेषज्ञ राबिया अख्तर ने सीएनएन से कहा है कि "बीजिंग सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति का सहभागी नहीं है, बल्कि प्राथमिक आर्किटेक्ट और मेजबान है।"
इस सम्मेलन के ठीक बाद चीन अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन भी 3 सितंबर को करेगा, जिसमें व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन भी शामिल होंगे। एससीओ के सदस्य देशों में चीन, रूस, भारत, ईरान, पाकिस्तान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान शामिल हैं, जो वैश्विक ऊर्जा भंडार के विशाल हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं और वैश्विक आबादी के लगभग 40% हिस्से पर शासन करते हैं। इस सम्मेलन में मोदी की मौजूदगी, शी जिनपिंग की अतिथि सूची को काफी मजबूत कर देती है। भारतीय प्रधानमंत्री पिछले साल कजाकिस्तान में हुए शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे। लेकिन अब वो अमेरिका से खराब होते संबंध के बीच चीन के तियानजिन पहुंच रहे हैं। जबकि एक हकीकत ये भी है कि पिछले 10 एससीओ शिखर सम्मेलन में मोदी ने सिर्फ 3 में हिस्सा लिया है, जो बताता है कि भारत ने एससीओ के महत्व को करना शुरू कर दिया था, लेकिन ट्रंप की वजह से भारत के लिए अब एससीओ काफी महत्वपूर्ण हो गया है।
मोदी और पुतिन का रेड कार्पेट स्वागत
शी जिनपिंग... भारत और अमेरिका के रिश्ते में आए इस दरार को समझ रहे हैं। सीएनएन के मुताबिक अगर एशिया में भारत के अलावा चीन का कोई भी बड़ा प्रतिद्वंदी नहीं है और अगर, भारत नरम हो जाए तो फिर चीन एशिया में अमेरिका के पैर उखाड़ सकता है। चीन अब यही कर रहा है और भारत-अमेरिका के टूट रहे संबंध का फायदा उठा रहा है। यही वजह है कि मोदी की मौजूदगी पश्चिमी मीडिया और वॉशिंगटन में चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति की रीढ़ ही भारत है।
इसके अलावा इस शिखर सम्मेलन की एक और बड़ी बात पुतिन की भी मौजूदगी है। पुतिन ने आने से पहले चीनी सरकारी मीडिया को दिए बयान में कहा कि रूस-चीन साझेदारी “दुनिया में स्थिरता लाने वाली ताकत” है। उन्होंने इसे “एक न्यायपूर्ण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाने” की दिशा बताया है। यह साफ इशारा था कि मॉस्को और बीजिंग अमेरिकी वर्चस्व वाली विश्व व्यवस्था को बदलने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। ईरान और बेलारूस जैसे देशों को SCO की सदस्यता मिलना भी इसी का उदाहरण है। इसीलिए अब तिआनजिन एससीओ शिखर सम्मलेन सिर्फ कूटनीति का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की तस्वीर भी है।
SCO शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ट्रंप के टैरिफ युद्ध ने सबसे ज्यादा अमेरिका के सहयोगियों को परेशान किया है। अमेरिका के करीब करीब सभी सहयोगी देशों की अर्थव्यवस्था पर टैरिफ का सबसे गहरा असर होगा और भारत, जिसपर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया गया है, उसकी इकोनॉमी पर इस टैरिफ का घातक असर होने की आशंका है। सीएनएन ने कहा है कि ट्रंप की नीतियों की वजह से चीन को वो मौका मिला है, जिसे उसने कुछ दिन पहले तक सपने में भी नहीं सोचा था। अब चीन ने इस एससीओ शिखर सम्मेलन को, पिछले 10 सालों में सबसे बड़ा समिट बना दिया है, जिसमें करीब 26 देशों के नेता हिस्सा ले रहे हैं।
SCO शिखर सम्मेलन से चीन बनेगा वैश्विक नेता?
सीएनएन के मुताबिक शी जिनपिंग इस शिखर सम्मेलन के जरिए अमेरिकी टैरिफ से राहत दिलाने वाला, एक स्थाई और वैकल्पिक देश के तौर पर पेश करने की है और इसे वो दोनों हाथों से भुनाने की कोशिश कर रहा है। इस शिखर सम्मेलन की सबसे खास बात ये होने वाली है कि इसमें भारत और पाकिस्तान जैसे कट्टर विरोधी, ईरान और सऊदी अरब जैसे ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी भी शामिल हो रहे हैं। सीएनएन ने एक्सपर्ट्स के हवाले से कहा है कि यही विविधता SCO की सबसे बड़ी ताकत है, क्योंकि यह दिखाता है कि बीजिंग, एशिया-यूरोप क्षेत्र में इतना प्रभावशाली हो चुका है, कि वह विरोधियों को भी एक ही टेबल पर बैठाकर बातचीत करवा सकता है। पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी ऑफ लाहौर की विशेषज्ञ राबिया अख्तर ने सीएनएन से कहा है कि "बीजिंग सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति का सहभागी नहीं है, बल्कि प्राथमिक आर्किटेक्ट और मेजबान है।"
#WATCH | Prime Minister Narendra Modi arrives in Tianjin, China. He will attend the SCO Summit here.
— ANI (@ANI) August 30, 2025
(Video: ANI/DD) pic.twitter.com/dWnRHGlt95
इस सम्मेलन के ठीक बाद चीन अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन भी 3 सितंबर को करेगा, जिसमें व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन भी शामिल होंगे। एससीओ के सदस्य देशों में चीन, रूस, भारत, ईरान, पाकिस्तान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान शामिल हैं, जो वैश्विक ऊर्जा भंडार के विशाल हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं और वैश्विक आबादी के लगभग 40% हिस्से पर शासन करते हैं। इस सम्मेलन में मोदी की मौजूदगी, शी जिनपिंग की अतिथि सूची को काफी मजबूत कर देती है। भारतीय प्रधानमंत्री पिछले साल कजाकिस्तान में हुए शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे। लेकिन अब वो अमेरिका से खराब होते संबंध के बीच चीन के तियानजिन पहुंच रहे हैं। जबकि एक हकीकत ये भी है कि पिछले 10 एससीओ शिखर सम्मेलन में मोदी ने सिर्फ 3 में हिस्सा लिया है, जो बताता है कि भारत ने एससीओ के महत्व को करना शुरू कर दिया था, लेकिन ट्रंप की वजह से भारत के लिए अब एससीओ काफी महत्वपूर्ण हो गया है।
मोदी और पुतिन का रेड कार्पेट स्वागत
शी जिनपिंग... भारत और अमेरिका के रिश्ते में आए इस दरार को समझ रहे हैं। सीएनएन के मुताबिक अगर एशिया में भारत के अलावा चीन का कोई भी बड़ा प्रतिद्वंदी नहीं है और अगर, भारत नरम हो जाए तो फिर चीन एशिया में अमेरिका के पैर उखाड़ सकता है। चीन अब यही कर रहा है और भारत-अमेरिका के टूट रहे संबंध का फायदा उठा रहा है। यही वजह है कि मोदी की मौजूदगी पश्चिमी मीडिया और वॉशिंगटन में चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति की रीढ़ ही भारत है।
इसके अलावा इस शिखर सम्मेलन की एक और बड़ी बात पुतिन की भी मौजूदगी है। पुतिन ने आने से पहले चीनी सरकारी मीडिया को दिए बयान में कहा कि रूस-चीन साझेदारी “दुनिया में स्थिरता लाने वाली ताकत” है। उन्होंने इसे “एक न्यायपूर्ण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाने” की दिशा बताया है। यह साफ इशारा था कि मॉस्को और बीजिंग अमेरिकी वर्चस्व वाली विश्व व्यवस्था को बदलने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। ईरान और बेलारूस जैसे देशों को SCO की सदस्यता मिलना भी इसी का उदाहरण है। इसीलिए अब तिआनजिन एससीओ शिखर सम्मलेन सिर्फ कूटनीति का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की तस्वीर भी है।
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